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all about Israel Palestine conflict in hindi



israel palestine map
इजरायल-फिलीस्तीन palestine and israel विवाद सिर्फ इन्हीं दो देशों के लिए नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए समस्या बना हुआ है. इस्लामिक आतंकवाद का जो भयावह रूप आज दुनिया देख रही है, उसके बीज कहीं इसी विवाद में दबे हुए हैं. आज की परिस्थितियों को देखते हुए यह तो तय है कि निकट भविष्य में यह सैकड़ो साल पुरानी समस्या सुलझती दिखाई नहीं दे रही है. इस समस्या को समझने के लिए हमें इतिहास में सैकड़ो साल पीछे जाना होगा, जहां इन देशों के शुरूआत और स्वीकृति के साथ ही इस समस्या की शुरूआत हुई है. यह भी पढ़े— भारत और इजरायल के मधुर संबंध

फिलीस्तीन का इतिहास israel palestine history

फिलीस्तीन पर लंबे समय तक रोम का शासन रहा और इतिहासकारों के अनुसार 63 ईसा पूर्व से लेकर 632 ईस्वी तक यह एक स्वतंत्र देश न होकर महान रोमन साम्राज्य का हिस्सा था। रोमन राज्य के तहत ही इस क्षेत्र में रोमनो का एक कबीला यहूद या यहूदी यहां आकर बसने लगे. रोमनों को यह स्वीकार नहीं था और उन्होंने बल पूर्वक यहूदियों को यहां से निकाला लेकिन फिर भी कुछ यहूदी इस क्षेत्र में रहने लगे. लंबे समय बाद जब रोमनो का अधिकार फिलीस्तीन पर समाप्त हो गया तो अरबो ने इस भू-भाग पर अधिकार कर लिया. इतिहासकारों के अनुसार 632 ईस्वी से 731 ईस्वी तक यह क्षेत्र भिन्न अरबी साम्राज्यों के अधिकार में रहा. अपने अधिकार के दौरान बड़ी संख्या में अरब के निवासी फिलीस्तीन में बसे और उन्हीें के साथ इस्लाम का भी यहा प्रादुर्भाव हुआ. इसके बाद जब ऐसा लगने लगा कि यहूदियों की बची खुची जनसंख्या भी इस क्षेत्र में नहीं बच पाएगी तभी इस क्षेत्र पर सलजुक तुर्कों ने अपना अधिकार कर लिया जो महान आॅटोमन साम्राज्य का हिस्सा थे. इस तरह फिलीस्तीन भी आॅटोमन साम्राज्य का हिस्सा बन गया. यह अधिकार पहले विश्व युद्ध तक जस का तस बना रहा. आॅटोमन साम्राज्य में फिलीस्तीन में यहूदियों की संख्या में काफी इजाफा हुआ. आॅटोमन साम्राज्य ने यहूदियों को इस क्षेत्र में फलने-फूलने का पर्याप्त अवसर दिया. साथ ही उनके साथ समान व्यवहार किया.

विश्व युद्ध और बंटवारा israel settlements

पहले विश्व युद्ध में एक बार फिर फिलीस्तीन के मालिक बदल गए. इस लड़ाई में तुर्की को हार का सामना करना पड़ा और फिलीस्तीन पर ब्रिटेन का अधिकार हो गया और युद्ध समझौते के अनुसार यह पूरी तरह ब्रिटेन के शासन में आ गया. इसके बाद 1948 तक लगातार फिलीस्तीन पर ब्रिटेन का अधिकार बना रहा, जब तक दूसरे विश्व युद्ध के बाद उपनिवेशवाद के विरोध के तौर पर ब्रिटेन ने उपनिवेशों को आजाद नहीं कर दिया. समस्या की शुरूआत यहीं से होती है, जैसे भारत को आजाद करते वक्त अंग्रेजों ने भारत को दो टुकड़ों में तकसीम करके भारत और पाकिस्तान नाम के दो मुल्क बनाए जिनके बीच कश्मीर आज तक विवाद का विषय बना हुआ है. ठीक उसी तरह फिलीस्तीन को आजाद करते वक्त उसके दो टुकडे कर दिए गए जिसमें पहले टुकड़े पर अरब लोगों को अधिकार दिया गया और दूसरे टुकड़े पर यहुदियों को.

फिलीस्तीन समस्या की शुरूआत why are palestine and israel fighting

फिलीस्तीन समस्या के मूल में दरअसल दो धार्मिक सभ्यताओं का टकराव है. वर्तमान इजरायल के जेरूशलय या येरूशलम यहूदी, इसाइयत और इस्लाम तीनों के लिए पवित्र है क्योंकि यहां किंग सोलोमन ने पहला पवित्र मंदिर बनाया, जिसे यहूदी अपना सबसे पवित्र स्थल मानते हैं तो इसाई मानते हैं कि ईसा मसीह को यहीं सूली पर चढ़ाया गया था. इस्लाम में इस शहर को मक्का और मदीना के बाद तीसरा सबसे पवित्र शहर माना जाता है. जेरूशलम या येरूशलम पर अधिकार करना इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है. दूसरी प्रमुख बात यह है कि यहूदी इसपर अपना परम्परागत हक मानते हैं और अरब के लोग भी इसी अधिकार का दावा करते हैं. आजादी के बाद इजरायल की स्थापना में ब्रिटेन और यहूदी एक तरफ हुए तो फिलीस्तीन में अरब लोगो की सहायता अन्य अरबी देशों ने की और एक देश में अधिकार के लिए दो दल खड़े हो गए.



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इजरायल के लिए यहूदी आंदोलन israel palestine conflict explained

यहूदी जाति को पूरी दुनिया में जगह-जगह सताया गया. दूसरे विश्व युद्ध में तो हिटलर ने चुन-चुन कर यहुदियों को प्रताड़ित किया और उनका सफाया करने की कोशिश की. यहूदियों के साथ सदियों से यही होता आया था. उन्हें पूरी दुनिया के देशों मे अलग निगाह से देखा जाता था और उनके साथ अलग तरह का व्यवहार तक किया जाता रहा. ऐसे में यहूदियों को यह लगने लगा कि उन्हें अगर सम्मान हासिल करना है तो अपनी प्राचीन भूमि और अपने देश को वापस हासिल करना होगा. दूसरे युद्ध में यहूदियों के व्यापक संहार के बाद इस विचार को गति मिली. पूरी दुनिया को उस समय यहुदियों के साथ सहानुभूति थी क्योंकि इस युद्ध का सबसे ज्यादा नुकसान उन्हें ही उठाना पड़ा था. यहूदी नेता थियोडोर हर्जल ने उसी दौर में यहुदी राज्य नाम से किताब लिखी और पूरी दुनिया में यहुदियों के देश के बारे में अपनी राय रखी. इस काम को अंजाम तक पहुंचाने के लिए स्वीट्जरलैण्ड के बासले शहर में यहूदियों का पहला अधिवेशन आयोजित किया गया. इसके बाद विश्व यहुदी संघ अस्तित्व में आया. इस आंदोलन ने पूरी दुनिया के यहूदियों को तो एक कर ही दिया. साथ ही दुनिया की सहानुभूमि भी उनके साथ हो गई. इस आंदोलन के दौरान ही फिलीस्तीन में यहूदी राष्ट्र की संकल्पना ने जन्म लिया और फिलीस्तीन में यहूदी राष्ट्र नजदीक दिखाई देने लगा. इससे वहां की बहुसंख्यक अरब जनता में आक्रोश बढ़ने लगा और टकराव होने लगे.

समस्या हल करने के शुरूआती प्रयास

पहले विश्व युद्ध के बाद यहूदियों और अरब के लोगों के बीच संघर्ष बढ़ने लगा और वहां शासन कर रहे ब्रिटेन के लिए यह चिंता की बात थी क्योंकि इस टकराव की वजह से पूरी दुनिया में उसकी छवि प्रभावित हो रही थी. ऐसे में इस समस्या को हल करने के लिए उसने अन्य राष्ट्रों के लिए नियुक्त मंत्री बाल्फोर को इसे सुलझाने का काम दिया गया.


बाल्फोर घोषणा और विवाद
बाल्फोर ने दोनों पक्षों की स्थितियों को देखने के बाद यह तय किया कि किसी के पक्ष में फैसला करने के बजाय बीच का रास्ता निकालना उचित रहेगा और 2 नवम्बर 1917 को बाॅल्फोर ने यहूदियों को फिलीस्तीन में बसने की इजाजत दी. साथ ही अरब मुस्लिमों को आश्वस्त किया कि उनके राजनीतिक और सामाजिक अधिकारों पर कोई आंच नहीं आएगी. इसके बाद कुछ समय के लिए शांति बनी लेकिन अरब मुस्लिमों ने यहूदियों के बढ़ते प्रभाव को देखकर एक बार फिर हिंसा का रास्ता अपना लिया और 1920 में पूरे फिलीस्तीन में मार-काट शुरू हुई. अपनी कम संख्या की वजह से यहूदियों को नुकसान उठाना पड़ा, ऐसे में ब्रिटेन ने एक बार फिर हस्तक्षेप किया और शांति स्थापित करने के लिए सैमुअल कमीशन की घोषणा की.

सैमुअल कमीशन

शांति स्थापित करने के लिए ब्रिटेन ने हरबर्ट सैमुअल की अध्यक्षता में एक कमीशन गठित किया गया और इस तरह हरबर्ट सैमुअल फिलीस्तीन के पहले हाई कमिश्नर बने. हाई कमिश्नर बनते ही श्री सैमुअल ने पहले विश्व युद्ध के बाद राष्ट्र संघ से किए अपने वादे के अनुसार स्थानीय जातियों को स्वशासन देने का काम शुरू कर दिया और एक कौन्सिल का निर्माण किया जिसमें कुल 22 सदस्य होते थे इसमें से 10 सदस्य मनोनीत किए जाते थे और 12 सदस्यों को निर्वाचन द्वारा चुना जाता था. इन चुने जाने वाले सदस्यों में 8 मुसलमान, 2 इसाई और 2 यहूदी होते थे. अरब मुस्लिम इस व्यवस्था से संतुष्ट नहीं थे और वे किसी भी तरह यहूदियों को शासन में हिस्सेदारी नहीं देना चाहते थे. टकराव एक बार फिर होने लगे तो ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री को खुद हस्तक्षेप करना पड़ा और 1922 में एक श्वेत पत्र निकाला गया जिसे इतिहास में चर्चिल श्वेत पत्र कहा जाता है. इस पत्र में अरब मुस्लिमों को यह आश्वासन दिया गया कि की उनके अधिकारों की रक्षा हर हालत में की जाएगी और वे क्षेत्र में शांति स्थापित करने में सरकार की सहायता करें. इस श्वेत पत्र से भी अरब मुस्लिमों को संतोष नहीं हुआ और हालत विकट होते चले गए. हिंसा की घटनाओं में सैकड़ों लोगों की मौत होने लगी और स्थानीय सरकार के हाथ से नियंत्रण चला गया. ऐसे मे हालत पर काबू पाने के लिए ब्रिटेन को फिलीस्तीन में अपनी वायु सेना उतारनी पड़ी.


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शाॅ कमीशन

हालत काबू में करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने शाॅ कमीशन का गठन किया, जिसका अध्यक्ष जाॅन हाॅप सिम्पसन को बनाया गया. इस रिपोर्ट में दो बातों का जिक्र किया गया जिसमें यहूदियों का फिलीस्तीन में बसने और बड़ी मात्रा में कृषि भूमि खरीदने को असंतोष की वजह बताई गई. ब्रिटिश सरकार ने इस रिपोर्ट के बाद यहूदियों के फिलिस्तीन में बसने पर रोक लगा दिया. यहूदियों ने इस फैसले का विरोध करना शुरू कर दिया और ब्रिटिश सरकार को पहले विश्व युद्ध के दौरान अपने किए होम नेशन के वादे की याद दिलाई और साथ ही अंतर्राष्ट्रीय दबाव बनाया. इससे ब्रिटिश सरकार को अपना फैसला वापस लेना पड़ा और कुछ शर्तों के साथ वापस यहूदियों को फिलीस्तीन में बसने की इजाजत दे दी गई. अरबों मे एक बार फिर असंतोष सर उठाने लगा और 1937 तक यह असंतोष खूनी संघर्ष में तब्दील हो गया. अब अरब मुस्लिम यहूदियों के साथ ही ब्रिटिश सरकार से लड़ने लगे और सैकड़ो लोगों की मृत्यु होने लगी.

राॅयल कमीशन और बंटवारे की आहट

अरब मुस्लिमों और यहूदियों के बीच बढ़ती कड़वाहट और हिंसा को रोकने के लिए मिस्टर पील की अध्यक्षता में एक और कमीशन गठित किया गया. इसे राॅयल कमीशन का नाम दिया गया. राॅयल कमीशन से सभी पहलुओं को जांचा और वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे की यहूदी और अरब मुस्लिम एक साथ नहीं रह सकते. यह पहला मौका था जब किसी कमीशन ने पहली बार अधिकारिक तौर पर फिलीस्तीन के बंटवारे का सुझाव दिया. राॅयल कमीशन ने स्थिती की गंभीरता को देखते हुए फिलीस्तीन को तीन भागों में विभाजित करने की मांग की. समुद्र तट से सटे हुए इलाको में यहूदियों की संख्या ज्यादा थी इसलिए उसे यहूदियों के लिए बीच का हिस्सा ब्रिटिश शासन में और तीसरा हिस्सा अरब मुस्लिमों को देने की अनुशंसा की गई. इस निर्णय से यहूदी प्रसन्न हुए क्योंकि इससे यहूदियों के लिए उनके अलग राष्ट्र की मांग पूरी होती दिख रही थी लेकिन अरब मुस्लिम इससे और ज्यादा नाराज हो गए. वे किसी भी तरह की हिस्सेदारी से साफ इंकार करने लगे और राॅयल कमीशन की रिपोर्ट पर कोई कार्रवाई नहीं हो सकी बल्कि इस रिपोर्ट से फिलीस्तीन मंे स्थितियां और ज्यादा खराब हो गई और अरब मुस्लिमों ने सरकार से सीधा युद्ध करते हुए एक कमिश्नर की हत्या कर दी क्योंकि उनका मानना था कि वह यहूदियों का हितैषी था. इससे ब्रिटिश सरकार नाराज हो गई और उन्होंने अरब मुस्लिमों के विरोध का बुरी तरह दमन किया. इस आग मंे अब यहूदियों और अरबियों के साथ अंग्रेज भी झुलसने लगे थे.


राष्ट्रसंघ का पहला कदम-वुडहेड कमीशन

जब ब्रिटिश सरकार के सभी कदम इस समस्या का हल निकालने में असफल रहे तो राष्ट्रसंघ आगे आया और इस समस्या को दूर करने के लिए उसने इसके लिए पहला कदम उठाते हुए वुडहेड कमीशन की नियुक्ति की. इस कमीशन ने भी फिलीस्तीन के बंटवारे की बात की लेकिन राॅयल कमीशन के प्रस्ताव को इसके लिए उपयुक्त नहीं माना. कमीशन ने बंटवारे को निर्धारित करने के लिए एक गोलमेज सम्मेलन बुलाने का प्रस्ताव दिया जिसमें ब्रिटिश सरकार, यहूदी प्रतिनिधिमंडल और फिलीस्तीन के अलावा आस-पास के सभी अरब देशों को आमंत्रित करने को कहा गया. फरवरी, 1939 में लंदन में इस गोलमेज सम्मेलन का आयोजन किया गया लेकिन वहां कोई फैसला नहीं हो सका. इसी दौरान हिटलर ने दूसरे विश्व युद्ध की घोषणा की दी और यहूदियों का दमन चालू हो गया. इस दमन की वजह से और ज्यादा यहूदी भाग कर फिलीस्तीन पहुंचने लगे और समस्या ज्यादा गंभीर हो गई.

द्वितीय विश्व युद्ध और फिलीस्तीन israel palestine war

दूसरे विश्व युद्ध में हिटलर द्वारा यहूदियों से किये गए बर्ताव ने पूरी दुनिया की सहानूभूति यहदियों के साथ कर दी. मई, 1939 में ब्रिटेन की सरकार ने एक दूसरा श्वेत पत्र निकाला जिसमें तीन वादे किये गए कि 10 साल में फिलीस्तीन को आजादी दे दी जाएगी, दूसरे वादे के तौर पर कहा गया कि इसमें पहले 5 साल में फिलीस्तीन में 75 हजार से ज्यादा यहूदियों को बसने नहीं दिया जाएगा और इसके बाद वाले 5 सालों में यहूदियों के बसने की संख्या को निर्धारित करने में अरब मुस्लिमों की भी राय ली जाएगी. तीसरे वादे में कहा गया कि फिलीस्तीन के कमीश्नर को अधिकार दिया जाएगा कि वे निर्धारित कर सकेंगे कि यहूदी फिलीस्तीन में जमीन किस कानून के तहत खरीदेंगे. इस श्वेत पत्र से भी अरब मुस्लिमों में विरोध का भाव कम नहीं हुआ क्योंकि वे किसी भी तरह यहूदियों को अपने साथ रखने को तैयार नहीं थे. यहूदियो ने भी इस श्वेतपत्र का विरोध किया. दूसरे विश्व युद्ध के आरंभ में हिटलर समर्थित संघ जीत रहा था, ऐसे में अरबों को यह विश्वास हो गया कि हिटलर अकेले ही सभी यहूदियों का सफाया कर देगा इसलिए ब्रिटिश सरकार से नाराज हो जाने के बावजूद फिलीस्तीन में कोई विद्रोह नहीं हुआ, जबकि यहूदियों ने ब्रिटेन की ओर से हिटलर के कृत्यों के खिलाफ दूसरे विश्व युद्ध में जमकर हिस्सा लिया. इससे ब्रिटेन प्रभावित हुआ लेकिन दूसरे विश्व युद्ध में बड़ी संख्या में यहूदियों को निर्वासित होना पड़ा था और ब्रिटेन ने उन्हें फिलीस्तीन में बसने की इजाजत नहीं दी. इससे यहूदी भड़क गए और हिंसा का रास्ता अख्तियार कर लिया. विश्व यहूदी संघ ने इस समस्या के निदान के लिए अपने नेता डेविड वेन गुरिआन को अमेरिका भेजा जहां उन्होंने बिल्टमोर योजना का प्रस्ताव रखा.

बिल्टमोर योजना

बिल्टमोर योजना या बिल्टमोर प्रस्ताव में तीन मांगे रखी गई. पहली मांग थी कि फिलीस्तीन में एक यहूदी राज्य बनाया जाए, जहां आसानी से यहूदी बस सके. दूसरी मांग आत्मरक्षा के लिए एक सेना के निर्माण करने की स्वतंत्रता देने की थी और तीसरे मांग में यहूदियों को फिलीस्तीन आने पर लगी रोक हटाने की इच्छा व्यक्त की गई. दूसरा विश्व युद्ध समाप्त होने के बाद ब्रिटेन और अमेरिका में राजनीतिक हालात बदल गए और ब्रिटेन मंे जहां लेबर पार्टी की जीत हुई और क्लीमेंट एटली प्रधानमंत्री बने, वहीं अमेरिका में ट्रूमेन को राष्ट्रपति बनने का मौका मिला. ट्रूमेन ने एटली से इस समस्या को हल करने का आग्रह किया तो ब्रिटेन ने अमेरिका के साथ मिलकर एक जांच कमेटी की घोषणा की जो इस समस्या का हल निर्धारित करने वाला था. कमेटी ने जांच के बाद यहूदियों को फिलीस्तीन में बसने और जमीन खरीदने की छूट दे दी और साथ ही आखिर में फिलीस्तीन में यहूदियों और अरब मुस्लिमों के दो राष्ट्र बनाने पर भी मुहर लगा दी. बंटवारे की शर्तों को निर्धारित करने के लिए लंदन में अरब और यहूदी प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया लेकिन कोई हल नहीं निकल सका और ब्रिटेन इस मामले को द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बने नये संगठन संयुक्त राष्ट्र संघ में ले गया.
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संयुक्त राष्ट्र संघ और इजरायल का निर्माण two state solution

संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस समस्या को सुलझाने के लिए 11 देशों को शामिल करते हुए स्वीडन डेलिगेट को यह काम सौंपा. इन 11 देशों में आॅस्ट्रेलिया, कनाडा, चेकोस्लोवाकिया, ग्वाटेमाला, भारत, ईरान, नीदरलैण्ड, पेरू, स्वीडन, उरूग्वे और युगोस्लाविया को शामिल किया गया. डेलिगेट ने अंतिम फैसला करते हुए फिलीस्तीन के विभाजन की घोषणा की और यहूदी और अरबियों के लिए अलग-अलग मुल्क का प्रस्ताव पारित कर दिया. पूर्वी भाग को अरब और पश्चिमी भाग को यहूदियों को दिया गया. साथ ही फिलीस्तीन में ब्रिटिश साम्राज्य के अंत की घोषणा की गई. 14 मई, 1948 को ब्रिटेन ने फिलीस्तीन से अपना शासन वापस ले लिया और इसी दिन यहूदियो ने अपने होमलैण्ड इजरायल के अस्तित्व में आने की घोषणा की दी. संयुक्त राष्ट्र संघ और रूस सहित कई देशों ने इस नये देश को अपनी मान्यता दे दी.


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